आरिफ़ मोहम्मद ख़ान कांग्रेस छोड़ने के बाद जनता दल में आ गए थे. जनता
दल की सरकार में भी मंत्री बने. जनता दल छोड़ने के बाद बहुजन समाज पार्टी
में आए और फिर 2004 में बीजेपी में शामिल हो गए.
आरिफ़ ख़ान के सामने ऐसी क्या मजबूरी आ गई थी कि जिस सांप्रदायिक राजनीति के सामने झुकने
का आरोप लगाकर राजीव गांधी से अलग हो गए और बाद में फिर उसी राजनीतिक पार्टी का हिस्सा बन गए जिन पर सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने और बाबरी मस्जिद
तोड़ने के आरोप लगे?
इस सवाल पर आरिफ़ मोहम्मद ख़ान भड़क गए. वो कहते हैं, ''जब बाबरी मस्जिद टूटी तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी.
ताला राजीव गांधी ने खुलवाया. क्या आपने कभी कांग्रेस से सवाल पूछा कि ये सब क्यों हुआ? आप मुझसे ये सवाल पूछ रहे हैं?"
क्या नरसिम्हा राव को आरिफ़ मोहम्मद ख़ान बाबरी विध्वंस के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं?
वो
कहते हैं, "1986 में जो फ़ैसले लिए गए उनसे नफ़रत पैदा हुई. जो समस्या
पैदा हुई, उसने हमें 1947 के विभाजन के वक़्त में पहुंचा दिया है. बाक़ी बाद में जो कुछ हुआ, वो तो इसका परिमाण ही था जो 1986 में हुआ. इसलिए जो 86
पर नज़र नहीं रखते, वो बाद की घटनाओं से अचंभित होते हैं. यह बड़ा देश है.
आप जो काम आज कर रहे हैं उसके नतीजे देखने में 25-30 साल लग जाएंगे."
लेकिन क्या इन तर्कों के सहारे आरिफ़ मोहम्मद ख़ान का बीजेपी में जाना सही साबित हो जाता है?
आरिफ़ कहते हैं, "तो क्या करता? कहीं नहीं जाता? दो ही पार्टियां थीं."
जब सावरकर की तस्वीर संसद में लगी तब बीजेपी में रहकर चुप रहे आरिफ़
आरिफ़
मोहम्मद ख़ान बीजेपी में जब शामिल हुए तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री
थे. इसी दौरान संसद में वीर सावरकर की तस्वीर वाजपेयी सरकार ने लगवाई थी. संसद में गांधी की भी तस्वीर है.
सावरकर गांधी की हत्या में
सहअभियुक्त रहे थे और वो हिन्दू राष्ट्र की वकालत करते थे. क्या संसद में
सावरकर की तस्वीर लगाए जाने से आरिफ़ ख़ान बीजेपी में रहते हुए ख़ुश थे?
इस सवाल पर ख़ान बुरी तरह से भड़क जाते हैं और कहते हैं कि ये सवाल कांग्रेस
से पूछिए कि वाजपेयी सरकार के जाने के बाद 10 सालों तक वो सत्ता में रही तो
क्यों नहीं सावरकर की तस्वीर हटवाई या विपक्ष में रहते हुए क्यों लगने
दिया?
आरएसएस का मानना है कि भारत केवल अंग्रेज़ों का ही ग़ुलाम नहीं
था बल्कि मध्यकाल में मुसलमान शासकों का भी ग़ुलाम था क्या आरिफ़ ख़ान इस
बात से सहमत हैं?
इसके जवाब में वो कहते हैं, "आपको लगता है कि सल्तनत में जो आए वो भारत में पैदा हुए थे? जो हिन्दुस्तान में पैदा हुए,
जिन्होंने हिन्दुस्तान को अपना मुल्क माना, उनकी बात अलग है. लेकिन
जिन्होंने आकर यहां साम्राज्य स्थापित किया, क्या वो यहां के थे? ये बात ज़रूर है कि ये अंग्रेज़ों की तरह संपत्ति लूटकर बाहर नहीं ले गए. इन्होंने
भारत को अपना घर बना लिया."
"लेकिन ऐसा तो है नहीं कि हम
क़ुतुबुद्दीन ऐबक के पास आवेदन लेकर गए थे कि तुम आ जाओ हमसे देश का शासन नहीं चल रहा है. भारत क़ुतुबुद्दीन ऐबक का ग़ुलाम था और इसमें कोई शक नहीं
है. जिन्होंने तलवार के ज़ोर पर शासन स्थापित किया भारत उनका ग़ुलाम था.''
हालांकि तब भारत कोई देश नहीं था और अलग-अलग शासकों के पास अलग-अलग इलाक़ों का
शासन था. दूसरी बात यह कि तलवार को ज़ोर पर केवल मुसलमानों ने ही शासन नहीं किया बल्कि हिन्दू शासकों ने भी बल का इस्तेमाल कर कई इलाक़ों को अपने
अधीन किया था.
राजीव गांधी ने अपनी मां की हत्या के बाद सिखों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा को लेकर कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की ज़मीन हिलती है. आरिफ़ ख़ान ने क्या तब भी राजीव गांधी से असहमति जताई थी
या विरोध किया था?
इस सवाल के जवाब में आरिफ़ ख़ान कहते हैं, "मैं नाराज़गी ज़ाहिर नहीं करता हूं. उन्होंने जो कह दिया, कह दिया, उन्हें ख़ुद भी तकलीफ़ रही होगी उस बयान से. वो बहुत ही पीड़ादायक बयान था."
हां, मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया था. मेरे दिमाग़ में उस वक़्त एक
चीज़ के अलावा कुछ और था ही नहीं. मैं अगर इस्तीफ़ा वापस लेने की बात मान
लेता तो लोगों को क्या मुंह दिखाता. संसद के अंदर एक घंटा खड़े होकर मैंने
कहा था और पूरे देश को बताया था कि शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने
बिल्कुल सही कहा है. ये क़ानून और क़ुरान के मुताबिक़ बिल्कुल सही था. जब
क़ानून मंत्री ने उस समय बिल संसद में पेश किया, उस वक़्त पीछे बैठकर
इस्तीफ़ा लिखा और प्रधानमंत्री के कार्यालय में दे दिया.
इसके बाद मैं अपने घर तक नहीं गया, किसी दोस्त के यहां चला गया था कि मेरी अब खोज
शुरू होगी और मैंने रात अपने दोस्त के घर बिताई. अगले दिन मैं संसद पहुंचा
और ये चाहता था कि मुझ पर कोई दबाव न डाला जाए. वहां अरुण सिंह जी ने पकड़ लिया और प्रधानमंत्री के दफ़्तर के बगल वाले वेटिंग रूम में बिठा दिया.
वहां सभी प्यार से समझाने लगे. आख़िर में जब मैंने नरसिम्हा राव जी को मना
कर दिया तब मुझे राजीव गांधी के कमरे में ले जाया गया, जहां उन्होंने कहा कि अच्छा तुम नहीं मान रहे हो तो इस वक़्त तुम्हारा इस्तीफ़ा स्वीकार कर
लेते हैं."
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान अभी किसी पार्टी में नहीं हैं लेकिन
उन्हें लगता है कि प्रतिक्रिया के कारणों पर ज़्यादा सवाल उठे न कि
प्रतिक्रिया देने वालों पर, चाहे प्रतिक्रिया ख़तरनाक ही क्यों न हो.
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