Sunday, May 26, 2019

मोदी ने जो किया वो न जवाहर लाल नेहरू के जमाने में था

लेकिन पार्टी के लोग राहुल गांधी या उनके नाम को हार के लिए ज़िम्मेदार नहीं मानते हैं. पार्टी के एक कार्यकर्ता सलाह देते हैं कि राहुल गांधी को किसी अमित शाह जैसे सहयोगी की ज़रूरत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी सहयोगी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को गुजरात और देश में बीजेपी की जीत की रणनीति बनाने का श्रेय दिया जाता रहा है.
ऐसा लगता नहीं है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता सार्वजनिक तौर पर इस हार के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार बताएंगे. यदि भूतकाल को संकेत माना जाए तो वो राहुल के पीछे खड़े ही नज़र आएंगे.
बीते दो सालों में राहुल के करियर ग्राफ़ में कुछ सुधार भी हुआ है. वो साये से निकलकर बाहर आए और उनके राजनीतिक व्यवहार में भी खुलापन आया. सोशल मीडिया पर उनका अभियान पहले से बेहतर हुआ और सरकार के नोटबंदी के विवादित फ़ैसले, रोज़गार की कमी, देश में बढ़ती असहिष्णुता और कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था पर मज़बूती से अपने तर्क रखे.
ये देखा गया कि अपने आक्रामक अभियान से वो एजेंडा निर्धारित कर रहे हैं और बीते साल दिसंबर में जब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वो अपनी पार्टी को सरकार बनाने की स्थिति में ले आए तो कई को लगा कि वो अपनी पार्टी को फिर से गिनती में ले आए हैं.
और इसी साल फ़रवरी में जब उनकी बहन प्रियंका गांधी ने औपचारिक रूप से राजनीति में क़दम रखा तो लगा कि गांधी कुछ करने जा रहे हैं.
कुछ कांग्रेसी समर्थक ऐसे भी हैं जिन्हें विश्वास है कि प्रियंका वो गांधी हैं जो इस राजनीतिक परिवार को बचा सकती हैं. कारण चाहे जो भी हों लेकिन प्रियंका राजनीतिक मशाल को थामने से कतराती रहीं थीं. प्रियंका और राहुल एक-दूसरे के काफ़ी करीबी हैं और राहुल को बाहर करने की किसी योजना में प्रियंका का शामिल होना बहुत संभव नहीं है. लेकिन ऐसा हो सकता है कि वो राहुल के साथ काम करने और उनका समर्थन करने में पहले से बड़ी भूमिका निभाएं.
अंततः कांग्रेस से इसे पार्टी की व्यापक विचारधारा की नाकामी ही मान रही है. जिस नए भारत को मोदी ने परिभाषित किया है और जिसकी नब्ज़ को उन्होंने पकड़ा है उसे समझने में और उससे जुड़ने में कांग्रेस नाकामयाब रही है.
लोगों की जिस तरह की आस्था उभरी है उनमें वो अप्रत्याशित है. भारत की आज़ादी के बाद ये पहली बार हुआ है कि किसी एक व्यक्ति का हिंदू समाज पर इतना प्रचंड रौब और पकड़ राजनीतिक दृष्टि से बन गई है.
ऐसा न जवाहर लाल नेहरू के जमाने में था और न ही इंदिरा गांधी के जमाने में. अगर इसको बड़े समीकरण में देखें तो लगभग 50 प्रतिशत वोट शेयर, सारी संस्थाएं बीजेपी के हाथ में हो जाएंगी. अगर कर्नाटक और मध्य प्रदेश की सरकार गिर गई तो राज्यसभा की संख्या में भी तब्दीली होगी.
इनके पास सिविल सोसाइटी का जो संगठन है आरएसएस और जो तमाम दूसरी संस्थाएं हैं, वो अपनी तरह की सांस्कृतिक चेतना पैदा करने की कोशिश कर रही हैं.
भारत की राजनीति में ये मौक़ा बिल्कुल अप्रत्याशित है. अब अगर ये पूछें कि ऐसा क्यों हुआ है तो इसके कई कारण बताए जा सकते हैं. जब हार होती है तो कई तरह की अटकलें लगाई जा सकती हैं.