Friday, August 31, 2018

फासीवादी शक्तियों के ख़िलाफ़ लड़ाई साज़िश नहीं: वरवर राव

माओवादियों से संबंध और भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार पांच कार्यकर्ताओं में से एक वरवर राव को उनके घर हैदराबाद ले आया गया है.
हैदराबाद के हवाईअड्डे पर पत्रकारों से बात करते हुए राव ने अपने और चार दूसरे कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले को झूठा करार दिया.
वामपंथी कवि और लेखक वरवर राव ने ज़ोर देकर कहा कि "फासीवादी नीतियां" के खिलाफ उनकी लड़ाई को साज़िश नहीं कहा जा सकता.
राव ने कहा कि भीमा-कोरेगांव में दलितों और ऊंची जाति वाले मराठाओं के बीच हुई झड़पों के मामले में महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार के खिलाफ केस दर्ज किया जाना चाहिए, ना कि कार्यकर्ताओं के खिलाफ.
पांचों कार्यकर्ताओं को मंगलवार को देश के अलग-अलग इलाकों से गिरफ्तार किया गया था. इन गिरफ्तारियों को लेकर कई लोगों ने नाराज़गी जताई थी.
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को इन गिरफ्तारियों को चुनौती देते हुए अर्ज़ी लगाई गई थी. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारियों को लेकर महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई की और कहा कि इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल में नहीं रखा जा सकता. कोर्ट ने 6 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई तक इन सभी को घर में नज़रबंद रखने के आदेश दिए हैं.
जिसके बाद पुणे पुलिस गुरुवार सुबह वरवर राव को हैदराबाद लेकर आई.
पुलिस उपायुक्त (सेंट्रल ज़ोन) विश्व प्रसाद ने कहा कि नज़रबंदी के दौरान उन्हें ना किसी बाहर वाले से मिलने की इजाज़त होगी और ना ही कहीं बाहर जाने की.
उन्होंने कहा, "राव से सिर्फ उनकी पत्नी और बच्चे मिल सकेंगे, वो भी सिर्फ तब, जब वो उनके साथ एक ही घर में रह रहे हों."
राव के घर के आस-पास स्थानीय पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतज़ाम किए हुए हैं.
राव के अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ता वरनॉन गोंज़ाल्विस, अरुण फ़रेरा, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा को भी माओवादियों से संबंधों के आरोप में गुरुवार को देश के अलग-अलग इलाकों से गिरफ्तार किया गया था.
भीमा-कोरेगांव घटना के नौ महीने बाद की गई महाराष्ट्र पुलिस की इस कार्रवाई पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया.
पुलिस का दावा था कि पिछले साल 31 दिसंबर को हुए "यलगार परिषद" - दलितों के सम्मेलन के बाद हिंसा भड़की थी.
पुलिस ने सम्मेलन में दिए गए कथित भड़ाऊ भाषणों को हिंसा की वजह बताया. पुलिस के मुताबिक भीमा-कोरेगांव से शुरू होकर ये हिंसा महाराष्ट्र के कई ज़िलों तक फैल गई, जिसकी वजह से जान-माल का नुकसान हुआ.
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Thursday, August 30, 2018

中国欲达减排目标仍需大力减煤

若不叫停新建燃煤电厂和煤制气项目,中国将无法兑现在2030年前确保温室气体排放达到峰值的承诺。
 
目前,各国代表正在准备参加下周在秘鲁首都利马举行的联合国气候谈判。作为世界最大的排放国,中国是否有能力停止并逆转煤炭用量的上升势头,成为关注的一大焦点。
 
在为期两周的谈判中,各国将仔细审视彼此的承诺,并将本国行动和目标的具体细节上呈联合国。这项工作要在2015年3月底之前完成,并为明年12月份的巴黎峰会做准备。

世界各国首脑将在巴黎大会上汇聚一堂,达成一项涵盖包括中国在内的所有主要排放国的全球气候协议。因此,巴黎大会必须避免像2009年哥本哈根峰会那样最终演变为一场围绕谁应该承担大部分减排责任的推诿大会。

11月中旬,中美联合声明中中国承诺到2020年将煤炭消费总量控制在42亿吨左右。分析人士认为,由于经济增速放缓、钢铁水泥等产能过剩行业的停工停产、抗雾霾措施,再加上可再生能源在新增发电能力中不断上升的比重,这一目标是可以实现的。
根据官方数据,中国2013年的煤炭消费总量为36亿吨。但一些观察人士认为,不断增长的电力需求意味着,如果不能采取强有力的行动减少煤炭在能源结构中比重,2020年达到煤炭消费上限的目标就很难实现。
 
美国环境信息机构的煤炭行业分析师阿亚卡·琼斯说:“2020年的煤炭上限目标非常宏大,需要强大的政策和监管加以支持与强化,但这并非无法办到。而且,还有一点重要的是,到2020年达到上限并不意味着‘峰值’,2020年以后会发生什么才真的令人关注。”

为了实现2020年的煤炭上限目标,以及兑现随之做出2030年后减少温室气体排放的承诺,中国各地方决策部门很有可能需要遏制未来的煤炭需求。直到目前,他们一直都在鼓励煤电的发展,以此来促进经济增长、保障就业。
 
煤炭发电向西部转移
 
中国面临的主要挑战之一就是减缓北部和西部各产煤大省新建“矿口”燃煤电厂的增速。在这些煤炭储量丰富但经济贫困的地区,电厂越修越多,一是为了给从东部迁移而来的产业供电,二是通过超效输电线路向沿海各大城市远距离供电。
 
同时,中国的能源企业也在计划建设巨大的煤制气工厂,但这项工艺的碳强度很高,将来也可能会因为给本就紧张的供水造成影响而被禁止。

对内蒙古和山西等省份来说,矿产开采行业是解决就业问题的重要部门,因此备受政府部门的庇护。但是,这些省份的决策者们也必须决定采取哪些必要措施,来满足中央政府(关于减排)的愿望。

很多新建燃煤电厂都将建在产煤大省。这些省份中绝大多数既没有开展排放交易试点,也没有制定地方排放上限。

查塔姆研究所中国能源问题专家米歇尔·梅丹说:“有很多问题还悬而未决(似乎也还在争论之中),包括:消费者要为此支付多少?产业合并对那些本就饱受经济放缓之累的省份会产生哪些影响?定价和补贴机制的发展速度能否跟上这一结构性变化?”

她还说:“中央政府的命令非常清楚,就看各省和产业如何来领会了。”
增长曲线

另一个主要问题是:限制燃煤发电需求增长的势头是否足够强大,从而保证2020年的煤炭消费总量控制在大体相同的时间转化为峰值。

一些专家指出,中国经济增长势头的好转和电力需求的增长,意味着新建燃煤电厂使用率的提高。这会造成二十一世纪二十年代煤炭需求的加速增长,阻碍中国二氧化碳排放上限的实现,而这些排放大部分都与燃煤有关。

《21世纪经济报道》引用厦门大学中国能源经济研究中心林伯强主任的话说:“今年的经济增长很缓慢,这是一个特例,很多企业都拥有大量的煤炭存量。等到这些存量消化完毕后,对煤炭的需求可能会再次增长。”

最近美国花旗银行的一份报告称,中国今年的经济增速放缓大于预期。只有长期维持这一态势,再加上高污染能源密集型产业的转型,才有可能在2030年前达到排放峰值。

花旗的分析师托尼·袁在报告中说:“如果中国的年经济增长率仍然维持在8%左右,虽然看上去只是比目前6-7%的增长率高了一点点,但要在2030年前达到排放峰值就非常困难而且成本高昂了。”

中国的煤炭消费要在2020年前后达到峰值,那么,大部分新增能源必须是可再生能源、核能或天然气,而且能够迅速实现并网。一些观察人士指出,这个趋势已经初现端倪,2013年中国新增水电、风电和太阳能装机容量首次超过热电。

中国中央政府已经做出要求,零二氧化碳排放发电在中国总发电量中的比例要从目前的22%增加到35%。绿色和平组织的能源分析师劳瑞·迈利维尔塔指出,这一目标对于实现中国的煤炭消费上限将大有帮助。
 
他说:“换句话说,从现在到2020年(至多到2030年),每个月新增的清洁能源容量大约相当于新建三个大型燃煤电厂。只要有恰当的政策,包括可再生能源发电企业的全面并网,我们相信这个目标是可以实现的。”

Wednesday, August 29, 2018

打击非法木材,中国需要一部法律

饮鸩止渴,在中国是一句家喻户晓的成语,意为饮用一种用鸟的羽毛浸制的毒药来解渴,指的用错误的办法来解决眼前的困难而不顾严重后果。毫不夸张地说,目前中国为解决非法木材贸易问题而提出的方案,正是这样一杯“能温柔地杀死你”的毒药。

当下,中国是全球最大的林产品进口国之一,因而中国是否、以及如何采取有效的措施,将非法木材阻挡在国外之外,关乎到全球森林和生态系统的存亡、更关乎中国的国际名誉。

过去十年,环境调查署( )在印度尼西亚、缅甸、俄罗斯、老挝、越南、莫桑比克、马达加斯加以及中国的实地调查显示,为满足中国市场而进行的非法砍伐已经在全球产生了影响:森林生态系统遭到了不可撤销的破坏,依赖森林的社区遭受了巨大的收入损失,腐败和冲突也与日俱增。

非法木材贸易问题已经引起了中国政府的重视,但问题是,中国目前并没有相关的立法,绝大部分在海外非法砍伐的木材,却能合法进入中国,EIA的报告揭示,每年进入中国的非法木材价值高达数十亿美元。

尽管中国的执法机关倾注了巨大人力物资来打击木材走私,中国海关目前主要依据CITES这一联合国公约执法,该公约所限制的树种有限,执法所获仅是沧海一粟。

全球每天被采伐的木材,大部分最终都到了中国、美国和欧盟三地。但在美国和欧盟,其法规要求进口商将非法木材排除在其供应链之外,未能进行尽职调查的企业可能遭到起诉。
由此,没有设立相应“防火墙”的中国,更将受到非法木材贸易的侵袭——EIA多年的调查发现,活跃在海外的众多中国不法木材企业的非法砍伐和木材走私活动,往往是得到了木材原产国当地企业和官员的助长和直接参与。

在此背景下,推行一份自愿性质的《中国企业境外可持续林产品贸易与投资指南》(后称《指南》)——目前中国有关部门为应对非法木材贸易而准备的方案,不仅治标不治本,而是如文章开头所说,可谓饮鸩止渴。

为什么《指南》这条路行不通?首先《指南》试图解决的,并非是问题的核心。《指南》的目的,是要约束中国木材企业在境外的行为。然而,中国目前的当务之急,是如何将被非法砍伐和走私出境的木材,阻挡在国门之外,这完全不属于《指南》的范畴。

其次,《指南》的条款属于自愿的性质,实际上无异于“口号”。与法律法规不同,《指南》不可能对唯利是图的商人有实质性的约束,更不能用于执法和惩罚。

历史经验表明,在此之前发布的另外两份类似的《指南》,在阻止非法木材进入中国方面几乎毫无成效。例如仅在一场遵守前《指南》培训会一个月后,与会的中国企业就又违背了莫桑比克的原木禁令,而这些原木多数能合法进入中国。

在私下的沟通中,中国林业部门的官员坦言,长期来看,中国的确需要有一部可执行的法规,以阻挡非法木材入境,但目前中国的情况尚不允许,况且立法的成本太高。这套言辞在EIA听来非常熟悉,当时还没有进行立法的欧盟和美国的政策制定者们,也曾发表过类似的疑虑。

但是,时代不同了,全球木材市场正在日趋采取法律监管措施,将非法木材排除在供应链之外。实际上,已经有中国企业在努力从自己的供应链上排除非法木材。若再不设立法律禁令,这些负责任的中国企业将会越来越难以同经营非法木材的企业展开竞争,自律者将变相受到惩罚。

向中国有关部门正式发出呼吁,不能再让一份无法进行执法的自愿《指南》推迟并本不可避免的举措——从今天起,阐明一个时间框架,为中国建立一套可以执行的木材监管办法。

Sunday, August 26, 2018

झारखंडः क्यों भा गई इंजीनियरों को दारोगा की नौकरी ?

पिताजी और भाई किसान हैं. वो लोग घर-गृहस्थी संभालने में ही जुटे होते हैं. तब क्या पढ़ना है, कहां नौकरी करनी है, ये फ़ैसला हमें लेना है. कई दफ़ा मन में आता रहा कि अपने ही राज्य में स्थायी नौकरी कर ली जाए. दारोगा की परीक्षा सामने थी. फॉर्म भरा, परीक्षा दी और चयन भी हो गया. लेकिन संघ लोक सेवा आयोग ( यूपीएससी) की मेरी असली आजमाइश बाकी है."
गढ़वा के रहने वाले गौतम कुमार सिंह आईआईटी से पढ़े हैं और हाल में झारखंड सरकार के नियुक्त किए गए दारोगाओं में उनका नाम शुमार है. गौतम ने आईआईटी गुवाहाटी से साल 2014 में केमिकल साइंस और टेक्नोलॉजी में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है.
इससे पहले उन्होंने नवोदय विद्यालय गढ़वा से बारहवीं की पढ़ाई पूरी की थी. वो बताते हैं कि पहली ही कोशिश में वो इंजीनियरिंग की परीक्षा में सफल हो गए थे.
हाल ही में झारखंड सरकार ने 2645 सब इंस्पेक्टरों की नियुक्तियां की है. नवनियुक्त दारोगाओं को राज्य के तीन पुलिस प्रशिक्षण केंद्रों में एक साल के प्रशिक्षण पर भेजा गया है.
अपर पुलिस महानिदेशक आरके मल्लिक ने बीबीसी को बताया है, 'नियुक्त हुए दारोगाओं में 535 युवा, इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के हैं'.
पुलिस महकमा ऐसे दरोगाओं का इस्तेमाल भी नई तैयारियों के साथ करना चाहता है.
आईआईटी से दारोगा, इस सवाल के जवाब में गौतम कहते हैं, ''मुझे पता है, ये सवाल आगे भी पूछे जा सकते हैं. कभी-कभार खुद से ये सवाल पूछता हूं. पर उतनी ही ज़ल्दी मैं इससे बाहर निकलता हूं. क्योंकि इंजीनियिरिंग की डिग्री के साथ मेरे पढ़ने और ऊंचे ओहदे पर जाने के ऑप्शन खुले हैं. अभी सब इंस्पेक्टर की ट्रेनिंग मेरी प्राथमिकता है.''
उनका कहना था कि आईआईटी से पढ़ाई के बाद उन्होंने तीन साल के लिए प्रधानमंत्री ग्राम विकास (पीएमआरडी) फेलोशिप मिली. इस फेलोशिप में उन्हें महीने में 75 हज़ार रुपये मिलते थे. इस दौरान वो छत्तीसगढ़ में थे. अपने ही राज्य में स्थायी नौकरी का मौका सामने था, तो इसका चयन कर लिया. हालांकि गौतम ये कहते हुए अपनी तस्वीर देने से मना करते हैं कि रहने दीजिए इसकी भी क्या ज़रूरत है.
पदमा (हजराबीगा) स्थित पुलिस ट्रेनिंग कैंप के प्राचार्य एसपी अजय लिंडा बताते हैं कि प्रशिक्षण हासिल करने के लिए 1,189 नवनियुक्त दारोगा ने यहां योगदान किया है.
इनमें लगभग छह सौ लोगों की उम्र 22 से 25 साल की है. 285 इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आए लोग हैं. इनमें 13 लड़कियां भी हैं.
इन युवाओं को तेज़-तर्रार दारोगा के तौर पर तैयार करने के लिए प्रशिक्षण के नए आयाम के साथ कक्षाएं तथ्यपरक हों, इसकी कोशिशें की जा रही हैं. वैसे इन युवाओं में सीखने की क्षमता भी है.
कोडरमा ज़िले के डोमचांच थाना में बतौर असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर तैनात अगस्त दूबे डालटनगंज के बारालोटा के रहने वाले हैं. उनके तीनों बेटे एक साथ दारोगा बनने में सफल हुए हैं.
इनमें बड़े पुत्र नीतेश दूबे ने पश्चिम बंगाल तथा मंझले पुत्र विकास दूबे ने बिनोवा भावे विश्वविद्यालय हज़ारीबाग से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. जबकि छोटे पुत्र ऋषिकेश दूबे ने डाल्टनगंज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है.
बिकेश दूबे बताते हैं कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही वैकेंसी का टोटा और कैंपस सेलेक्शन का हाल देख महसूस होने लगा था कि आगे परेशानी हो सकती है. जबकि कई दोस्त भी अक्सर आशंकाओं पर चर्चा करते थे.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरियों की तैयारी में जुटे थे. इस बीच दारोगा की बंपर वैकेंसी निकली. तब वे 24 साल के थे. और सामान्य कोटा से दारोगा में नियुक्ति के लिए 26 साल की उम्र तय थी. तभी तय कर लिया कि इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना है. क्योंकि आगे उम्र का तकाजा हो सकता है.
पिता पुलिस की नौकरी में हैं, क्या उनका भी दारोगा बनने पर जोर था, इस सवाल पर बिकेश कहते हैं, "नहीं, वे सिर्फ यही कहते थे कि प्रशासनिक सेवा के लिए विशेष ध्यान देते रहो."
बिकेश और नीतेश ने झारखंड लोकसेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा भी पास की है, लेकिन मुख्य परीक्षा में विलंब होने से वे निराश भी होते रहे.
हमने बिकेश से ये पूछा था कि क्या पुलिस की नौकरियों में कथित ऊपरी कमाई पर भी नजरें लगी होती हैं, इस सवाल पर वो दो टूक कहते हैं इस बारे में कभी कोई ख्याल नहीं आया.
उन्हें पुलिस महकमे और सरकार की उम्मीदों के अनुरूप बढ़िया दारोगा ज़रूर बनना है. फिर सब इंस्पेक्टर की तनख्वाह भी कम नहीं है. और ज़िम्मेदारी भी मामूली नहीं.
बिकेश के बड़े भाई नीतेश दूबे बताते हैं कि 2014 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कोलकाता की एक स्टार्टअप कंपनी मे बीस हज़ार की तनख्वाह पर काम मिला था. मन नहीं लगा तो छह महीने काम करके वापस घर आया. सरकारी नौकरी प्राथमिकता थी क्योंकि घर-गांव में इसकी चर्चा तो होती ही रही है कि अपने ही राज्य में स्थायी नौकरी ज़्यादा बेहतर है. वैसे तीनों भाईयों का झारखंड लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास करने का भी इरादा कायम है. नीतेश को इसकी खुशी ज़्यादा है कि छोटा भाई ऋषिकेश 22 साल की उम्र में दारोगा बन गया है.
अगस्त दूबे अपने बेटों की सफलता पर कहते हैं कि बड़े अरमान से दो बेटों को इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई थी. वो यह भी चाहते थे कि बेटे प्रशासनिक अफसर बनें. अब उन लोगों ने पुलिस सेवा का चयन किया है, तो इसी में आगे बढ़ें.
अपर पुलिस महानिदेशक आरके मल्लिक बताते हैं कि झारखंड पुलिस स्मार्ट पुलिसिंग की ओर बढ़े इसी मकसद से इस बार दारोगा की नियुक्ति में उम्र सीमा 26 से 30 साल निर्धारित थी.
इनके अलावा तैयारी ये भी है कि राज्य के चार बड़े शहरों- रांची, जमशेदपुर, बोकारो तथा धनबाद में सब इंस्पेक्टर की ज़िम्मेदारी लॉ एंड ऑर्डर तथा अनुसंधान दोनों को अलग किया जाए. सभी तरह के केस की रिसर्च में गुणात्मक सुधार हो इसके लिए नवनियुक्त दारोगा लगाए जाएंगे. इनके अलावा 450 दारोगा स्पेशल ब्रांच में तैनात किए जाएंगे.
आरके मल्लिक बताते हैं कि साइबर क्राइम झारखंड के लिए चुनौतियां हैं. लिहाजा तकनीकी बैकग्राउंड के दारोगा की काबलियत इन मामलों में भी परखी जाएगी.
बड़ी संख्या में इंजीनियरों के पुलिस सेवा में आने के सवाल पर वे कहते हैं कि उन्हें लगता है कि युवाओं ने अपने ही राज्य में मिले इस अवसर को सफलता में बदलने की कोशिश की है.
अब सब इंस्पेक्टर की सैलेरी भी अच्छी हो गई है. ट्रेनिंग पीरियड में ही उन्हें 40-45 हज़ार मिल सकते हैं.
फिर पुलिस सेवा में ईमानदार, सजग, कर्तव्यनिष्ठ होकर काम करने से समाज में प्रतिष्ठा तो मिलती ही रही है.
26 साल के जीतेंद्र कुमार हज़ारीबाग के रहने वाले हैं और साल 2015 में उन्होंने बीआइटी सिंदरी से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. जीतेंद्र इन्हीं बातों से इत्तेफ़ाक रखते हैं.
जीतेंद्र कहते हैं,'' निजी कंपनी में इंजीनियरिंग की नौकरी तो तुरंत मिली, पर काम वही पंप चालू कराओ, बंद कराओ और तकनीकी फ़ॉल्ट को दुरूस्त करो. अक्सर ख़ुद से पूछता कि ये कहां आ गए हम. फिर पब्लिक के बीच कुछ काम करने की इसमें गुंजाइश कहां है. तभी तय कर दिया कि ट्रैक चेंज करना है.''
दारोगा की नौकरी में आने के सवाल पर वे साफ़गोई से कहते हैं, "मेरे मन में झारखंड के लिए और ख़ासकर आदिवासियों के बीच काम करने की इच्छा है."
"बीआईटी सिंदरी सरकारी कॉलेज होने की वजह से मेरी पढ़ाई में घर वालों पर कोई बड़ा आर्थिक बोझ नहीं पड़ा. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद एक निजी कंपनी में मैंने नौकरी भी की थी, लेकिन मन नहीं लगा. लिहाजा काम छोड़कर घर चला आया और सरकारी नौकरी की तैयारी में जुट गया. इस बीच दारोगा की वैकेंसी आई, तो लगा ये काम मेरे लिए पक्का रहेगा."
जीतेंद्र कहते हैं कि पढ़ाई का मौका मिलता रहा, तो झारखंड लोकसेवा आयोग की परीक्षा में शामिल हो सकता हूं. लेकिन सब इंस्पेक्टर की ज़िम्मेदारी से किसी किस्म का समझौता नहीं करना चाहूंगा. ट्रेनिंग टफ है, लेकिन इन चुनौतियों को पार करना है.

Friday, August 17, 2018

प्रेस रिव्यू: 'अंतरिक्ष में मानव मिशन पर ख़र्च होंगे 10 हज़ार करोड़'

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के कुछ-कुछ हिस्से को प्रकाशित किया है.
मसलन कश्मीर पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सोच की तारीफ़, 50 करोड़ लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं और बदलता भारत. साथ ही अख़बार ने 2022 तक अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजने की बात को पहले पन्ने पर जगह दी है. इस घोषणा के बाद इसरो के चेयरमैन के शिवन ने कहा कि इस मिशन को पूरा करने में क़रीब 10 हज़ार करोड़ रुपये की लागत आएगी. केरल में तेज़ बारिश और बाढ़ से जुड़ी ख़बर को भी अख़बार ने पहले पन्ने पर जगह दी है. अख़बार के मुताबिक बाढ़, भू-स्खलन और तेज़ बारिश के चलते केरल में अब तक 67 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. ने बिहार के नालंदा स्थित एक संग्रहालय से चोरी हुई बुद्ध की प्रतिमा के वापसी की ख़बर को प्रकाशित किया है. 12वीं सदी की यह कांस्य प्रतिमा 60 साल पहले चोरी हो गई थी. बाद में यह मूर्ति लंदन में निलामी के लिए रखी गई थी, जिसे बुधवार को ब्रिटेन में भारत के राजदूत वाईके सिन्हा को सौंप दिया गया.
हिंदुस्तान टाइम्स
द हिंदू ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की ख़बर को पहले पन्ने पर छापा है. अख़बार लिखता है कि बुधवार के दिन अचानक से उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया जिसके बाद वाजपेयी को जीवन रक्षक प्रणाली
इकोनॉमिक टाइम्स
द हिंदू ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की ख़बर को पहले पन्ने पर छापा है. अख़बार लिखता है कि बुधवार के दिन अचानक से उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया जिसके बाद वाजपेयी को जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया है. अटल बिहारी वाजपेयी पिछले 9 हफ़्तों से एम्स में भर्ती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई वरिष्ठ नेता बुधवार को एम्स पहुंचे.
ने अपने खेल पन्ने पर पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान अजीत वाडेकर के निधन की ख़बर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है. अजीत 77 साल के थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे.
पर रखा गया है. अटल बिहारी वाजपेयी पिछले 9 हफ़्तों से एम्स में भर्ती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई वरिष्ठ नेता बुधवार को एम्स पहुंचे.
ने पूर्व पत्रकार और आम आदमी पार्टी के नेता रहे आ
अख़बार ने जेएनयू के छात्र उमर ख़ालिद से जुड़ी एक ख़बर को भी पहले पन्ने पर जगह दी है. बुधवार को एक स्पेशल टीम उमर को लेकर दोबारा कांस्टीट्यूशन क्लब गई और 13 अगस्त को हुए उन पर हमले का सीन री-क्रिएट किया.
शुतोष के पार्टी छोड़ने की ख़बर को पहले पन्ने पर छापा है. हालांकि आम आदमी पार्टी प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उनका इस्तीफ़ा स्वीकार करने से इनकार कर दिया है. आशुतोष ने पार्टी छोड़ने की वजह को नितांत निजी बताया है.

Friday, August 10, 2018

ऑपरेशन ब्लूस्टार: तारीख-दर-तारीख जानिए रणनीति को कैसे दिया गया अंजाम

ऑपरेशन ब्लू स्टार की 34वीं बरसी 6 जून को है. इसके मद्देनजर स्वर्ण मंदिर के आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं. ऑपरेशन ब्लू स्टार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से अलगाववादियों को खाली कराने का अभियान था, जो बीते 3 वर्षों से वहां डेरा जमाए बैठै थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर सेना का यह ऑपरेशन मुख्य तौर पर 3 से 8 जून 1984 तक चला. हालांकि, इस अभियान की रणनीति पर काफी पहले से काम शुरू हो चुका था. अमृतसर में सिखों के सबसे पवित्र गुरुद्वारे स्वर्ण मंदिर के पास अपने हथियारबंद साथियों के घेरे में भिंडरावाले छिपा बैठा था.
1981: पंजाब और असम में आतंकवादियों का मुकाबला करने की गुप्त गतिविधियों के लिए स्पेशल ग्रुप या एसजी नाम से एक और यूनिट तैयार की गई.
1982: डायरेक्टरेट जनरल सिक्योरिटी ने प्रोजेक्ट सनरे शुरू किया. उसने सेना की 10वीं पैरा/स्पेशल फोर्सेज के एक कर्नल को 50 अधिकारियों और सैनिकों की एक टुकड़ी गठित करने का काम सौंपा, जिसमें सभी भारतीय थे. इस तरह कमांडो कंपनी 55, 56 और 57 तैयार हुई. इस यूनिट को स्पेशल ग्रुप नाम दिया गया और यह रॉ के प्रमुख के मातहत काम करने लगी. स्पेशल ग्रुप को ऑपरेशन सनडाउन के लिए तैयार किया गया.
1983: भिंडरावाले ने हरमंदिर साहब को पूरी तरह अपना अड्डा बना लिया. इस साल के शुरू के दिनों में स्पेशल ग्रुप यानी एसजी नाम की एक गुप्त यूनिट से सेना के छह अधिकारियों को इजरायली कमांडो फोर्स सायरत मतकल के गुप्त अड्डे पर पहुंचाया गया. तेलअवीव के पास स्थित इस अड्डे पर इन सैनिक अधिकारियों को सड़कों, इमारतों और गाडिय़ों के बड़ी सावधानी से बनाए गए मॉडलों के बीच आतंक से लड़ने की 22 दिन तक ट्रेनिंग दी गई.
फरवरी 1984: स्पेशल ग्रुप के सदस्य श्रद्धालुओं और पत्रकारों के वेश में स्वर्ण मंदिर में घुसकर आसपास का सारा नक्शा देख आए.
अप्रैल 1984: डायरेक्टर जनरल सिक्योरिटी ने पीएम इंदिरा गांधी को स्वर्ण मंदिर को दबोचने के लिए एक गुप्त मिशन के बारे में बताया, जो सैनिक हमले से कुछ ही कम था. उनका कहना था कि ऑपरेशन सनडाउन असल में झपट्टा मारकर दबोचने की कार्रवाई है. हेलिकॉप्टर में सवार कमांडो स्वर्ण मंदिर के पास गुरु नानक निवास गेस्ट हाउस में उतरेंगे और भिंडरावाले को उठा लेंगे. ऑपरेशन को यह नाम इसलिए दिया गया कि सारी कार्रवाई आधी रात के बाद होनी थी, जब भिंडरावाले और उसके साथियों को इसकी उम्मीद सबसे कम होगी. लेकिन आम लोगों की मौत की आशंका से इंदिरा गांधी ने इस अभियान को हरी झंडी नहीं दी. ऑपरेशन सनडाउन के रद्द होने के बाद ब्लूस्टार की तैयारी हुई.
1 जून 1984: सीआरपीएफ और बीएसएफ ने गुरु रामदास लंगर परिसर पर फायरिंग शुरू कर दी. सेना के आदेश के तहत हो रही इस फायरिंग में कम से कम 8 लोग मारे गए.
2 जून 1984: भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा सील कर दी. पंजाब के गांवों में आर्मी की 7 डिविजन तैनात कर दी गई. रात होते होते मीडिया और प्रेस को कवरेज करने से रोक दिया गया. पंजाब में रेल, रोड और हवाई सेवाएं सस्पेंड कर दी गईं. पानी और बिजली की सप्लाई रोक दी गई. विदेशि‍यों और एनआरआई की एंट्री पर भी पाबंदी लगा दी गई.
3 जून 1984: पूरे पंजाब में कर्फ्यू लगा दिया गया था. सेना और पैरामिलिट्री फोर्सेज की गश्त बढ़ गई. मंदिर परिसर से लगे आने जाने के सभी रास्ते सील कर दिए गए.
4 जून 1984: सेना ने भिंडरावाले के सैन्य सलाहकार शाबेग सिंह की किलेबंदी को खत्म करने की कार्रवाई शुरू कर दी. एतिहासिक रामगढिया बंगा पर बमबारी शुरू की गई. इस दौरान करीब 100 लोग मारे गए. एसजीपीसी के पूर्व प्रमुख गुरुचरण सिंह तोहड़ा को भिंडरवाले से बातचीत के लिए भेजा गया. इस दौरान गोलीबारी रोक दी गई. हालांकि, तोहड़ा की बातचीत नाकाम रही जिसके बाद फायरिंग फिर से शुरू हो गई.
5 जून, 1984: सुबह होते ही हरमंदिर साहिब परिसर के भीतर गोलीबारी शुरू हुई. सेना की 9वीं डिविजन ने अकाल तख्त पर सामने से हमला किया. रात में साढ़े दस बजे के बाद काली कमांडो पोशाक में 20 कमांडो चुपचाप स्वर्ण मंदिर में घुसे. उन्होंने नाइट विजन चश्मे, एम-1 स्टील हेल्मेट और बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रखी थीं. उनके पास कुछ एमपी-5 सबमशीनगन और एके-47 राइफल थीं. उस समय एसजी की 56वीं कमांडो कंपनी भारत में अकेला ऐसा दस्ता था, जिसे तंग जगह में लड़ने का अभ्यास कराया गया था. हर कमांडो शार्पशूटर, गोताखोर और पैराशूट के जरिए विमान से छलांग लगाने में माहिर था और 40 किलोमीटर की रफ्तार से मार्च कर सकता था. उनमें से कुछ ने गैस मास्क पहन रखे थे और ज्यादा असरदार आंसू गैस, सीएक्स गैस के गोले छोड़ने के लिए गैस गन ले रखी थीं.
6 जून, 1984: सुबह चार बजे के आसपास तीन विकर-विजयंत टैंक लगाए गए. उन्होंने 105 मिलिमीटर के गोले दागकर अकाल तख्त की दीवारें उड़ा दीं. उसके बाद कमांडो और पैदल सैनिकों ने उग्रवादियों की धरपकड़ शुरू की. सुबह छह बजे रक्षा राज्यमंत्री के.पी. सिंहदेव ने आर.के. धवन के निवास पर फोन किया. उन्होंने इंदिरा गांधी तक यह संदेश पहुंचाने को कहा कि ऑपरेशन कामयाब रहा, लेकिन बड़ी संख्या में सैनिक और असैनिक मारे गए हैं.
7 जून, 1984: सेना ने हरमंदिर साहिब परिसर पर प्रभावी कब्जा जमा लिया.
8 जून, 1984: तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह ने स्वर्ण मंदिर का दौरा किया. हालांकि, उनके साथ मंदिर गए एसजी दस्ते के कमांडिंग ऑफिसर, एक लेफ्टिनेंट जनरल किसी उग्रवादी निशानची की गोली से बुरी तरह घायल हो गए.
10 जून, 1984: दोपहर तक पूरा ऑपरेशन खत्म हो गया.
31 अक्टूबर, 1984: इंदिरा गांधी को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने गोली मार दी थी.